विराट मंदिर शहडोल : भारत के मध्य प्रदेश  राज्य का एक ज़िला विराट नगरी कहे जाने वाला शहडोल जिसमें कई धार्मिक स्थल है जहाँ घुमने या मन की शांति के लिए जा सकते हैं जिसमें विराट मंदिर सोहागपुर तहसील में है। इस क्षेत्र में प्राचीन विराटेश्वर मंदिर, जो अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक शक्ति के लिए जाना जाता है, जिसको पत्थर में कविता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान शिव की पूजा विराटेश्वर के रूप में की जाती है, जो सृष्टि के संपूर्ण स्वरूप का एक अवतार है। पुजारी और ग्रामीणों के अनुसार, भगवान विराटेश्वर को देखना बारह ज्योतिर्लिंगों को देखने के बराबर माना जाता है क्योंकि यह व्यक्ति को सर्वोच्च चेतना को महसूस करने की अनुमति देता है। आज हम इस लेख में विराटेश्वर मंदिर के बारे में जानेंगे;-

विराट मंदिर के बारे में जानकारी | इतिहास | फोटो

विराट मंदिर शहडोल | विराटेश्वर मंदिर

विराटेश्वर मंदिर शहडोल जिले के सोहागपुर तहसील में स्थित है, यह शहडोल से लगभग 8 से 10 किलोमीटर में स्थित है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अनुसार, त्रिपुरी के कलचुरियों, जिन्हें चेदी के कलचुरिस के नाम से भी जाना जाता है, इन्होंने 10 वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया था। इस वास्तुशिल्प सुन्दरता का निर्माण का श्रेय महाराजा युवराजदेव प्रथम को दिया जाता है।

मंदिर, जिसमें एक गर्भ गृह, एक अंतराल और एक मंडप है, जिसे वास्तुकला की वेसर शैली में बनाया गया है और यह एक निचले मंच पर खड़ा है। पूर्व की ओर मुख वाले इस मंदिर की अत्यधिक चित्रित बाहरी दीवारों में मूर्तियों की तीन पंक्तियाँ हैं। पिछले कई हजार साल पुराने मंदिर का शिखर करीब डेढ़ से दो फीट पीछे झुका हुआ है। हालांकि मंदिर का हाल ही में पुनर्निर्माण किया गया है। लेकिन मंदिर की स्थिति ठीक नहीं है।

मूर्तियां, भगवान शिव और भगवान विष्णु के विभिन्न योग मुद्राएं, देवी-देवता, पुष्प और रैखिक विषय, और बाहरी अग्रभाग पर अन्य भाग्यशाली हिंदू प्रतिमाएं हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास एक भव्य नंदी और शेर की मूर्ति है। दीवार पर कामुकता का प्रतिनिधित्व करने वाली विस्तृत रूप से मूर्तियों को उकेरा गया।

पुरुषों और महिलाओं की कई यौन मूर्तियाँ मुख्य आकर्षण हैं। चेहरे के भाव, शरीर की भाषा, और प्रत्येक आकृति पर विवरण, पुरुष और महिला दोनों, कलाकारों की आविष्कार शीलता, प्रतिभा और निपुणता का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह कलचुरियों की भव्यता, कारीगरी और स्थापत्य की खोज के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक है, और यह देखने लायक है। मुख्य प्रवेश द्वार के मध्य में चतुर्भुज के आकार में भगवान विष्णु की एक भव्य मूर्ति है, जिसके बाईं ओर वीणावादिनी और दाईं ओर भगवान गणेश हैं। देवी यमुना और गंगा गर्भ गृह की प्रवेश दीवारों को सुशोभित करते हैं।

किवदंती के अनुसार, यह क्षेत्र कभी विराट या मत्स्यदेश के महाभारत के राज्य का हिस्सा था, और इसके राजा महाराजा विराट के नाम पर कहा जाता था। पौराणिक कथा के अनुसार, पांडवों ने इस देश में अपने अज्ञातवास (गुप्त निर्वासन) बिताए थे। महाभारत के अनुसार, पांडवों और द्रौपदी ने अपने सभी हथियारों को एक कपड़े में लपेटा और वनवास के अपने अंतिम वर्ष में प्रवेश करने से पहले एक पुराने शमी वृक्ष पर रख दिया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मंदिर के पास शमी वृक्ष में उनके हथियार मिले, जिससे पुष्टि हुई कि पांडवों ने अपने अंतिम वर्ष का निर्वासन यहां बिताया था। बाणगंगा में, एक अर्जुन कुंड है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि अर्जुन ने अपने बाणों से इसका निर्माण किया था।

शिव मंदिर की विशेषताएं

पुरातत्वविद् रामनाथ सिंह परमार के अनुसार विराट मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि यह शिव को समर्पित है और शहर के पूर्व की ओर स्थित है। गर्भगृह में शिवलिंग एवं जलधारी है। गर्भगृह की प्रवेश शाखाएं देवताओं से भरी हुई हैं। बाईं ओर गणेश और दाईं ओर सरस्वती की मूर्ति बीच में नटेश शिव द्वारा दर्शाए गए हैं। जो काफी अनोखा है। जो लोग इसे देखने आते हैं वे भावुक हो जाते हैं। इसके अलावा, मंदिर के अंदर और भी मूर्तियाँ हैं जो सुंदर देवी-देवता की हैं।

प्राचीन प्रतिमा

इस मंदिर परिसर में बहुत सी प्राचीन मूर्तियाँ भी है जिसमें भगवान शिव की शिवलिंग ,गणेश प्रतिमा, कृष्ण प्रतिमा, हनुमान भगवान की प्रतिमा, राम जानकी मंदिर जिसमें प्राचीन विष्णु प्रतिमा, जो की बहुत प्रमुख है। गर्भगृह में 8 इंच ऊंचा शिव लिंग स्थापित किया गया है। वीणावादिनी को दाईं ओर, ब्रह्मा को योग मुद्रा में बाईं ओर और भगवान विष्णु को बीच में दर्शाया गया है। नंदी, अर्जुन गांडीव, उमा महेश्वर, वरद मुद्रा में भगवान गणेश, भगवान नटराज, नवग्रह, देवी सरस्वती, सप्त मातृका, अप्सरा, अष्टदिकपालक, और अन्य उत्तम मूर्तियों में से हैं।

मंदिर की बाहरी दीवार पर मूर्तियों को तीन समूहों में व्यवस्थित किया गया है। शिव के कई रूप हैं, जिनमें उनके विभिन्न शिव अवतार और उनके परिवार शामिल हैं। विभिन्न रूपों में दिगपाल, साथ ही विष्णु की मूर्तियाँ हैं। इस मंदिर में ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेव के मूर्ति भी हैं। देवी गौरी और नवदुर्गा के कुछ रूपों को भी चित्रण किया गया है। यह मंदिर कई अप्सराओं के शिल्प कौशल को भी प्रदर्शित करता है।

विराट मंदिर का इतिहास

यह मंदिर कलचुरी शासको द्वारा बनवाए गये उत्कृष्ट स्मारकों में से एक है। स्थापत्य एवं कला-शैली के आधार पर लगभग 11वीं शती ई. के समय का प्रतीत होता है। इस विरासत की रक्षा के उद्देश्य से इस मंदिर को 1975 में केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को सौंप दिया गया था। हालांकि, प्रकृति के प्रकोप के कारण मंदिर का पिछला आधा हिस्सा 1997 से ही पीछे की ओर झुका हुआ है। मंदिर की हालत आज भी ठीक नहीं है।

बाण गंगा कुंड

बाण गंगा में बने कुंड को पांडवों के अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने अपने तीर के प्रहार से बनाया था इसलिए इस कुंड का धार्मिक महत्त्व बहुत है। इस कुंड के जल को श्रावण में भगवान भोलेनाथ को चढ़ाया जाता है और श्रावण माह में बहुत भीड़ होता है। कहा जाता है की राजा विराट के द्वारा पशुपालन अधिक किया जाता था लेकिन जल की कमी के कारण पशु की मृत्यु हो जाती थी तब भगवान कृष्ण के कहने पर ऐसे कुंड की उत्पति की गई जिसके जल का उपयोग पशु, पक्षी, मनुष्य सभी कर सके, और इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर होते है कुंड में स्नान करने दूर-दूर से लोग जाते है।

जन श्रुति के अनुसार ऐसा कहा जाता है, की कौरवों ने राजा विराट पर हमला कर दिया था और उनका पशु को पांडवों ने ले लिया। जंगल में घूमते हुए पांडवों और पशुयों को प्यास लगी थी आस-पास कही जल नहीं मिलने के कारण अर्जुन ने तीर चलाया और जमीन से जल की धरा फुट गई और तब से इसे बाण गंगा के नाम से भी जाना जाता है।

बाण गंगा का मेला

बाण गंगा मेला मकर सक्रांति के समय लगने वाला इस संभाग का सबसे बड़ा मेला है। वहाँ लगने वाली मेला अपने आप में ही सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हैं मेले की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। मकर सक्रांति के दिन से शुरू होकर यह मेला पांच दिन तक चलती हैं यह मेला लगभग 125 साल पुराना है, इस मेले की शुरुआत तत्कालीन महाराज गुलाब सिंह ने वर्ष 1895 में कराई थी, तब से आज तक बाण गंगा में मेला का आयोजन किया जाता है और बड़ी संख्या में लोग वहाँ जाते है साथ ही शिव दर्शन भी करते है।

खजुराहों की याद दिलाती है शहडोल में स्थित विराट मंदिर

पुरातत्वविद् रामनाथ सिंह परमार के अनुसार मंदिर की संरचना खजुराहो की यादें ताजा कर देती है। खजुराहो से मिलता-जुलता यह मंदिर बनाया गया है। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण चंदेल राजाओं ने करवाया था। विराट मंदिर को कलचुरी राजाओं ने महाकौशल या विंध्य क्षेत्र में बनवाया था। 9वीं सदी से लेकर 12वीं सदी तक वहां काफी शिल्पकारी की गई थी। जिसमें अनोखे मंदिरों और मूर्तियों का निर्माण किया गया। यह मंदिर 10वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का है। वे खजुराहो से काफी मिलती हैं। खजुराहो के मंदिरों में भी इसी तरह मूर्तियों की स्थापना की गई है। इस स्थान पर मूर्तियों के ऊपर मूर्तियों को चित्रित किया गया है।

कब और कैसे जाये

वैसे तो आप विराटेश्वर मंदिर कभी भी जा सकते हैं लेकिन प्राकृतिक वादियों के साथ मेला का मजा लेना है तो मकर सक्रांति में वहाँ आपको जाना चाहिए शहडोल पहुँचना बहुत ही आसन है आप बस, रेल किसी भी माध्यम से जा सकते हैं

  • निकटतम वायु मार्ग;-जबलपुर 143 किलोमीटर है जो की निकटतम हवाई अड्डा है।
  • निकटतम रेलवे स्टेशन;- निकटतम रेलवे स्टेशन शहडोल स्टेशन हैं,  शहडोल रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
  • निकटतम बस स्सटैंड ;- सोहागपुर बस स्टैंड है, सड़क मार्ग शहडोल राज्य के प्रमुख शहरों के साथ-साथ आसपास के अन्य राज्यों के साथ सड़क मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

इन्हें भी देखें:- धुआंधार जलप्रपात के बारे में जानकारी

सवाल जवाब

शहडोल कौन से जोन में है?

दक्षिण-पूर्वी रेलवे के बिलासपुर-कटनी खंड पर स्थित शहडोल अपने मुख्यालय से इसका नाम व्युत्पन्न किया, यह मध्य प्रदेश के मध्य-पूर्वी भाग में स्थित है।

मंदिर का निर्माण किस शासक ने करवाया था?

मंदिर का निर्माण कलचुरी शासक ने करवाया था।

विराट मंदिर कहाँ स्थित है?

विराट मंदिर मध्य प्रदेश के शहडोल जिला के सोहागपुर में स्थित है।