Dholkal Ganesh: दंतेवाड़ा घने जंगलों, झरनों उचें-ऊँचें पर्वतों और गुफाओं से घिरा है यह जंगली क्षेत्र होने के कारण यहाँ लाजबाव पर्यटन स्थल है जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते है। उन्हीं में से एक है ढोलकल गणेश मंदिर जो घनें जंगलों के ऊपर प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ चट्टानों के ऊपर विराजमान है। गणेश जी की मूर्ति जो ढोल का आकार धारण किये हुए है और इसलिए इसे ढोलकल के नाम से जाना जाने लगा। तो आइये जानते है की क्या ढोलकल को इतना अनोखा बनाता है?

ढोलकल गणेश मंदिर के बारे में जानकारी

ढोलकल गणेश मंदिर

दंतेवाड़ा के फरसपाल गाँव के करीब 11 किलोमीटर दूर ढोलकल पहाड़ी पर ढोलकल गणेश मंदिर स्थित है। यह पहाड़ी पर लगभग 3000 फीट की ऊंचाई पर, 1000+ साल पुरानी भगवान गणेश की मूर्ति है लोहे से समृद्ध बैलाडीला पर्वत श्रृंखला के हरे-भरे जंगलों के ऊपर ढोलकल पहाड़ी स्थित है। इसी पहाड़ी की चोटी पर स्थित गणेश प्रतिमा की उत्पत्ति स्पष्ट नहीं है। यह मूर्ति 11वीं शताब्दी की मानी जाती है। माना जाता है कि मूर्ति का निर्माण 9वीं या 10वीं शताब्दी में नागा राजवंश के शासनकाल के दौरान किया गया था।

असाधारण रूप से विशाल और आश्चर्यजनक रूप से गढ़ी गई गणेश मूर्ति को इतने घने जंगल के बीच पहाड़ी की चोटी पर रखा गया है। मूर्ति लगभग 3 फीट लंबी है और इसमें शानदार नक्काशी है जो इस क्षेत्र के लिए असामान्य है। सितंबर 2012 में दंतेवाड़ा में बैलाडीला की गहरी वन श्रृंखलाओं में एक पुरातत्वविद् के द्वारा खोज की गई और इसे सदियों तक अनदेखा किया गया था। लेकिन अब ढोलकल गणेश की प्रतिमा की पूजा की जाती है जिसमें हजारों पुरातात्विक और ऐतिहासिक बातें छिपे हैं। ढोलकल गणेश मंदिर तक पहुँचना आसान नही है क्योंकि यह घनें जंगलों के माध्यम से लम्बी यात्रा के बाद उस सुन्दर स्थान पर पहुँच पाते हैं।

ढोलकल का इतिहास और रहस्य

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम ने एक बार भगवान शिव के दर्शन करने की इच्छा जताई थी। दूसरी ओर, भगवान शिव ने भगवान गणेश को अपने रक्षक के रूप में चुना था, और उन्होंने परशुराम को अंदर जाने से मना कर दिया। जब उन्होंने अपने रास्ते में जबरदस्ती करने की कोशिश की, तो गणेश ने परशुराम को यहां बैलाडीला पर्वत श्रृंखला से पृथ्वी पर फेंक दिया।

जब परशुराम को होश आया, तो वे और गणेश युद्ध में गए। युद्ध के दौरान, परशुराम ने गणेश के दांतों में से एक को काटने के लिए अपने फरसा (एक प्रकार का लोहे का हथियार) का इस्तेमाल किया। और उनका दांत काट गिरा दिया फलस्वरूप, गणेश को एकदंत के रूप में भी जाना जाने लगा और पहाड़ी के सबसे निकट की बस्ती को फरसपाल (परशुराम के हथियार के नाम पर) के रूप में जाना जाता है। यह भी कहा जाता है कि परशुराम का फरसा यहां दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद, बैलाडीला पर्वत श्रृंखला लौह अयस्क से समृद्ध हो गई।

एक बार किसी ने गणेश की इस मूर्ति को जंगल से नीचे फेक दिया था जिससे गणेश प्रतिमा रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। एक जांच के बाद मूर्ति को 56 टुकड़ों में पहाड़ी के तल पर टूटा हुआ पाया गया; वास्तव में, एक कठिन और जोखिम भरे खोज प्रयास के बावजूद, मूर्ति के टूटे हुए हिस्से को एकत्र नहीं किया जा सका। बाद में, पुरातत्वविदों की एक टीम ने शेष सभी टुकड़ों को इकट्ठा किया और उसी पहाड़ी की चोटी पर मूर्ति का पुनर्निर्माण किया। खंडित भागों के निशान आज भी मूर्ति पर देखे जा सकते हैं।

मंजिल के रूप में सुखद
ढोलकल लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए एक पवित्र स्थल रहा है, लेकिन 2012 में इसकी पुन: खोज के बाद से, यह सभी के लिए एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गया है। ऊपर से घाटी का शानदार नज़ारा के अलावा, ढोलकल पहाड़ी में घने जंगल, झाड़ियों, पेड़ों के माध्यम से शानदार चढ़ाई करना पड़ता है। हाइक रूट शुरू से पहाड़ी की चोटी तक लगभग 4-5 किलोमीटर है। अंतिम 100-200 मीटर की चढ़ाई खतरनाक है क्योंकि इसमें कुछ खड़ी चट्टानों पर चढ़ना पड़ता है। अंत में, शिखर से दृश्य देखने लायक होता है प्रकृति का इनता खुबसूरत नजारा इससे पहले आप देखें नहीं होंगे।

ढोलकल ट्रेक जाने का सबसे अच्छा समय

गणेश की पूजा पूरे साल की जा सकती है। गर्मियों (अप्रैल से जून) के दौरान, चिलचिलाती धूप घने जंगल के ऊंचे पेड़ की छाया से होते हुए जा सकते है। लेकिन एक बार जब आप शिखर पर पहुँच जाते हैं, तो चिलचिलाती धूप का सामना करने के लिए तैयार रहें, यहाँ की चट्टानें धुप से पूरा गर्म हो जाता है।

ढोलकल की यात्रा के लिए मानसून (जुलाई से सितंबर) सबसे अच्छा समय है यदि आप मानसून के समय जाते है तो धुंध भरे पहाड़ों, बादलों से ढकी चोटियों, बूंदा बांदी पानी, नम मिट्टी, मिट्टी की खुशबू और ताज़ी न्यू कोमल पत्तियों का आनंद लेते हुए आगे बढ़ सकते हैं।

ढोलकल चोटी पर जाने के लिए सर्दी (अक्टूबर से मार्च) शायद सबसे खूबसूरत मौसम है, जिसमें उत्कृष्ट ठंडा तापमान, नीला आसमान और हरे-भरें पेड़ पौधा, पत्ते की हरियाली के साथ चिड़िया की चहचहाती सुन्दर आवाज के साथ ढोलकल पहाड़ी की चढ़ाई कर सकते हैं।

कैसे पहुंचें

ढोलकल पहुंचने के लिए आपको सबसे पहले दंतेवाड़ा शहर जाना होगा। दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र की राजधानी जगदलपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर है।

बस के माध्यम से :- जगदलपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब लगभग 300 किलोमीटर दूर है। रायपुर से जगदलपुर और दंतेवाड़ा के लिए निजी कैब और सार्वजनिक बसें दोनों आसानी से उपलब्ध हैं। छ.ग.अन्य प्रमुख शहरों बिलासपुर,दुर्ग,कांकेर,जगदलपुर से भी दंतेवाड़ा के लिए बसे उपलब्ध है।

ट्रेन के माध्यम से :- दंतेवाड़ा नियमित ट्रेनों के साथ पहुँचा जा सकता है और दंतेवाड़ा दो नियमित ट्रेनों के साथ विशाखापत्तनम से भी जुड़ा हुआ है।

नीजी वाहन के माध्यम से :-दंतेवाड़ा के ढोलकल पहाड़ी तक आप अपने नीजी वाहन के माध्यम से भी पहुँच सकते है।

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सवाल जवाब

ढोलकल गणेश मंदिर कहाँ है?

दंतेवाड़ा से ढोलकल बस्ती के नजदीकी गांव फरसपाल से करीब 11 किलोमीटर दूर है।

ढोलकल गणेश का प्रतिमा कितना पुराना है?

विशेषज्ञों के अनुसार ढोलकल गणेश की मूर्ति लगभग 1000+ वर्ष पुराना है।

ढोलकल गणेश प्रतिमा पहाड़ियों में कितनी ऊंचाई पर है?

ढोलकल गणेश का प्रतिमा पहाड़ियों में लगभग 3000 फीट की ऊंचाई पर है।