बृहदेश्वर मंदिर: तमिलनाडु राज्य हर तरह से अनोखा और खास है यहाँ की संस्कृति, धर्म,सरसता और सुन्दरता पर्यटकों का मन मोह लेती है यहाँ पर्यटकों के लिए काफी कुछ खास और बेहतरीन है यहाँ आकर ऐसे दृश्य को भी देख सकते है जिसकी मात्र आप कल्पना ही कर सकते है। यहाँ प्राकृतिक स्थलों के साथ साथ कई सारे मंदिर भी हैं उन्हीं में से एक है बृहदेश्वर मंदिर, यह मंदिर ऐतिहासिक शहर तंजावुर (जिसे पहले तंजौर के नाम से जाना जाता था) में स्थित है, यह देखने लायक है। मंदिर पूजा स्थल से बढ़कर यह तंजावुर में घूमने के लिए सबसे बेहतरीन जगह है। इस लेख में हम बृहदेश्वर मंदिर के बारे में विस्तार से जानेंगे:

Brihadisvara Temple: तमिलनाडु के तंजौर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर के बारे में जानकारी

बृहदेश्वर मंदिर

बृहदेश्वर मंदिर को आमतौर पर “तंजावुर बड़ा मंदिर” कहा जाता है। यह राजराजेश्वरम या पेरुवुदैयार कोविल बृहदेश्वर को समर्पित एक मंदिर है।यह
मंदिर तंजावुर के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है, ग्रेट लिविंग चोल मंदिर, जिसमें बृहदीश्वर, गंगईकोंडा और ऐरावतेश्वर शामिल हैं, यह मंदिर, जिसे दक्षिणा मेरु या सदन माउंटेन के नाम से भी जाना जाता है, इन्हें राजा राजा चोल प्रथम ने 1010 ईस्वी में बनवाया था। तमिल में बृहदीश्वरैन का अर्थ है “बड़ा भगवान”, इसलिए इस मंदिर को “बड़ा मंदिर” भी कहा जाता है। शैववाद, वैष्णववाद और शक्तिवाद सभी हिंदू परंपराएं हैं जिन्हें बृहदीश्वर एकीकृत करता है।

ग्रेनाइट पत्थरों से बना तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर है यह मंदिर राजराज चोल के शासन काल के दौरान लगभग पांच सालों में बनवाया गया था। चोल-काल की द्रविड़ वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है। 2010 में अपनी 1000 वीं वर्षगांठ मनाई। मंदिर “महान जीवित चोल मंदिर” यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है।

मंदिर का निर्माण

मंदिर का निर्माण मजबूत दीवारों से घिरा हुआ है, जो संभवत: 11वीं शताब्दी में बनाए गए थे। विमानम (मंदिर टॉवर) दुनिया का सबसे ऊंचा 216 फीट (66 मीटर) है। प्रवेश द्वार पर, एक ही चट्टान से उकेरी गई नंदी (पवित्र बैल) की एक बड़ी मूर्ति है पूरा मंदिर भवन ग्रेनाइट से बना है। मंदिर तमिलनाडु के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है।

मंदिर का निर्माण 1003 से 1010 ईसा पूर्व के बीच चोल शासक राजराज चोल प्रथम ने करवाया था इनके नाम पर इस मंदिर को राजराजेश्वर नाम दिया गया था यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का बेमिशाल उदाहरण हैं जिसे देखकर आप सोचने में मजबूर हो जायेंगें की उस टाइम में भी बीना टेक्नोलॉजी के इस तरह विशाल मंदिर का निर्माण कैसे हो सका। यह अपने समय की विश्व की विशालतम संरचनाओं में से एक गिना जाता है 13 मंजिला बने इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 66 मीटर है यह मंदिर भगवन शिव को समर्पित है।

बृहदेश्वर मंदिर की वास्तुकला

बृहदेश्वर मंदिर की वास्तुकला सच में हैरान कर देने वाली है लगभग 216 फीट की ऊँचाई वाले इस मंदिर को लगभग 1,30,000 टन ग्रेनाइट के पत्थरों से बनाया गया है जो की बिना मोटर, सीमेंट के सिम्पली एक के ऊपर एक रखे गये हैं, इस तकनीक को पजल तकनीकी कहा जाता है इस ग्रेनाइट पत्थरों की कटिंग इस प्रकार से की गई थी की वे नोज की तरह आपस में फीट हो जाते। आश्चर्य की बात यह की तंजौर में लगभग 60 किलोमीटर दुरी तक ना कोई पहाड़, ना कोई पत्थरों का चट्टानें हैं सवाल यह उठता है की यह भारी भरकम पत्थर आखिर आये कहाँ से, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है।

मंदिर के शीर्ष पर स्वर्ण कलश रखा गया है और जिस पत्थर पर स्वर्ण कलश रखा गया है उस पत्थर का वजन करीब 80 टन है जो एक ही पत्थर को तरास कर बनाया गया है। कहा जाता है 1.6 किलोमीटर की दुरी तक लम्बी रैंप बनाया गया होगा और लगभग तीन हजार हाथियों की मदद और मजदूरों की सहायता से पत्थरों को यहाँ लाया गया होगा।

वैसे तो आमतौर पर बिना नींव के ना तो मकान बनता है और ना ही किसी तरह की इमारते लेकिन इस विशालकाय मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक बात ये है की यह बीना नींव के हजारों साल से खड़ा है यह एक रहस्य ही है की बीना नींव के इतनें सालों से टिका हुआ है इस मंदिर की सबसे प्रमुख विशेषता यह है की मंदिर की छाया जमीन पर नहीं पड़ती है मंदिर की वास्तुकला इतनी शानदार तरीके से किया गया है की जब सूरज अपने चरम पर होती है फिर भी मंदिर की छाया जमीन पर नहीं पड़ती है।

मंदिर की हर ईंट में रचनात्मकता और कई कहानियां हैं। यह मंदिर एक आध्यात्मिक केंद्र होने के अलावा आर्ट गैलरी और सामुदायिक आकर्षण के रूप में भी बनाया गया है। इस मंदिर की ऊपरी बहरी दीवरों पर प्रसिद्ध शास्त्रीय भरत नाट्यम के विभिन्न आसन उकेरे गये है इस मंदिर के शिलालेखों पर “राजराजेश्वरम” नाम भी दिखाई देता है।


वेदों के अनुसार, अतीत में हिंदुस्तान में दो प्रमुख जाति व्यवस्थाएं थीं, जिन्हें शैव और वैनाव कहा जाता था। जो लोग शैव धर्म को अपनाते हैं, वे भगवान शिव को अपने सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में पूजते हैं, जबकि वैनाव भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। शैव धर्म को तमिल लोगों की दिव्यता माना जाता है “चोल” वे लोग थे जिन्होंने शैव धर्म और जीवन शैली को बढ़ावा दिया। चोल राजवंश के निवासियों ने बंगाल की खाड़ी को एक छोटी सी झील के रूप में देखा, और उन्होंने कई क्षेत्रों में शैव धर्म की महिमा का प्रसार किया। चोल राजवंश के एक प्रमुख सम्राट राजराज चोल ने तंजौर बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण किया, जिसे कुंजरमल्लन राजराज पेरुथच्चन द्वारा डिजाइन किया गया था। यह भव्य संरचना हजारों वर्षों के बाद भी कई प्राकृतिक आपदाओं और विदेशी आक्रमणों को झेलते हुए समय की साक्षी के रूप में खड़ी है। मंदिर की निर्माण तकनीक ने दुनिया के जानकारों को हैरान कर दिया।

बृहदेश्वर मंदिर की मूर्तियाँ

गर्भगृह और विमान (टॉवर), नंदी हॉल, असेंबली हॉल (मुखमंडपम), सभा हॉल (महामंडपम) और सबसे बड़े दक्षिण भारतीय मंदिरों (मंडप) में से एक के पांच भाग हैं। गर्भगृह में स्थित शिवलिंग भारत की सबसे बड़ी अखंड मूर्तियों में से एक है। पीठासीन देवी को करुवरई के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “गर्भ कक्ष।” इसका 16 मंजिला ग्रेनाइट विमान, जो दक्षिण भारत में सबसे बड़ा है, इसके अंदर भैराव,दुर्गा,सरस्वती,गणेश,विष्णु, पार्वती, मुरुगन, नंदी, और कई महत्वपूर्ण और शानदार मूर्ति हैं। मंदिर को उस स्थान के लिए भी जाना जाता है जहां 11 वीं शताब्दी में पहली बार पीतल की नटराज की मूर्ति स्थापित की गई थी। सुंदर मूर्तियां, अलंकृत सजावट और आकर्षक भित्ति चित्र मंदिर की दीवारों, फर्शों और छतों को सुशोभित करते हैं।

बृहदेश्वर मंदिर में विशाल शिवलिंग

मंदिर में प्रवेश करते ही एक 13 फुट ऊंचा शिवलिंग आगंतुकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। शिवलिंग के साथ एक विशाल पंचमुखी सर्प विराजमान है, और इसके फन शिवलिंग को छाया प्रदान करते हैं। इसके दोनों ओर दो मोटी दीवारें हैं जो लगभग 6 फीट की हैं। बाहरी दीवार पर एक विशाल आकृति है जिसे ‘विमान’ के नाम से जाना जाता है।

बृहदेश्वर मंदिर में नंदी की प्रतिमा

बृहदेश्वर मंदिर में विशाल नंदी की मूर्ति है, यह लगभग 12.5 फुट ऊँची, 8 फुट लम्बी, और 5 फुट चौड़ी है, इस मूर्ति को एक ही चट्टान को तरास कर बनाया गया भारत की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है नंदी की मूर्ति मंदिर के दरवाजें में बनाया गया है इस मूर्ति को मंदिर परिसर के रक्षक के रूप में स्थापित किया गया है। जो इस मंदिर को और भी आकर्षक बना देती है।

बृहदेश्वर मंदिर का इतिहास

बृहदेश्वर अथवा बृहदीश्वर मन्दिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक हिंदू मंदिर है जो 11वीं सदी के आरम्भ में बनाया गया था। इसे तमिल भाषा में बृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है। बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कावेरी नदी के तट पर चोल राजवंश के राजराज चोल प्रथम द्वारा नई राजधानी तंजावुर के दक्षिणपूर्वी क्षेत्र में किया गया था, यह चोल राजवंश के दो सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है।

बृहदेश्वर का मंदिर 1002 ईस्वी में, अरुल्मोझीवर्मन, एक तमिल सम्राट, जिसे राजराज चोल प्रथम के नाम से जाना जाता है, इन्होने बृहदेश्वर मंदिर की नींव रखी। यह तमिल चोल के कई विशाल निर्माण प्रयासों में से पहला था। मंदिरों में सही प्रकार की द्रविड़ वास्तुकला को प्रदर्शित करता है और दक्षिणी भारत में चोल साम्राज्य की विचारधारा और तमिल सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है। बृहदेश्वर मंदिर “निर्माण, चित्रकला, कांस्य ढलाई और मूर्तिकला में चोल की शानदार उपलब्धियों की गवाही है।”

दावा किया जाता है कि सम्राट राजराज चोल ने कांचीपुरम में पल्लव राजसिम्हा मंदिरों को देखने के बाद भगवान शिव के लिए इतना विशाल मंदिर बनाने का सपना देखा था। बृहदेश्वर मंदिर में ग्रेनाइट चट्टानों का पूरी तरह से उपयोग करने वाली पहली इमारतों में से पहला है, और इसे 1003 से 1010 ईस्वी तक लगभग पांच वर्षों में पूरा किया गया था। बृहदेश्वर / पेरुदैयार मंदिर जिसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया है। भारतीय इतिहास में, बृहदेश्वर मंदिर का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत है।

बृहदेश्वर मंदिर में दर्शन का समय

बृहदेश्वर मंदिर सुबह 6 बजे से रात 8.30 बजे तक खुला रहता है। भक्त और आगंतुक मंदिर परिसर में सुबह 5 बजे से ही लाइन लगाना शुरू कर देते हैं, रविवार को, जब मंदिरों में अत्यधिक भीड़ होती है, तो कोई भी व्यक्ति INR 5 के लिए एक विशेष दर्शन टिकट खरीद सकता है।

  • सुबह:- 6:00am से 12:30pm
  • शाम:- 4:00pm से 8:30pm

Brihadisvara Temple Photos


बृहदेश्वर मंदिर कब और कैसे जाये

बृहदेश्वर मंदिर का यात्रा करने का सबसे अच्छा समय सर्दियों का मौसम होता है। सुखद जलवायु प्रसिधियों के कारण यह मंदिर यात्रा के लिए सबसे अच्छा होता है। आप चाहे तो फरवरी माह में महाशिवरात्रि के समय भी जा सकते है महाशिवरात्रि यहाँ का मुख्य त्योहार है अगर आप दर्शन के साथ भीड़ का मजा लेना चाहते है तो आपको इसी समय जाना चाहिए।

तंजौर और उसके आसपास के सभी पर्यटक आकर्षणों का पता लगाने के लिए, आपको पहले यह पता लगाना होगा कि तंजौर कैसे पहुंचा जाए। तंजौर जाने के लिए, आप परिवहन के निम्नलिखित साधनों में से एक ले सकते है।

निकटतम हवाई अड्डा :- त्रिची अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा यहाँ से मंदिर की दूरी लगभग 65 किमी है।

निकटतम रेलवे स्टेशन :- तंजौर का रेलवे स्टेशन त्रिची, चेन्नई, मदुरै और नागोर से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग :- राजमार्गों का एक विस्तृत नेटवर्क तंजौर को तमिलनाडु के सभी प्रमुख शहरों के साथ-साथ केरल में कोच्चि, एर्नाकुलम और तिरुवनंतपुरम और कर्नाटक में बैंगलोर से जोड़ता है। आप बस सेवाओं और पर्यटक टैक्सियों के माध्यम से तंजौर और उसके आसपास के पर्यटन स्थलों तक जा सकते हैं।

सवाल जवाब

तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर का निर्माता कौन था?

चोल शासक प्रथम राजराज चोल।

भारत में विश्व का पहला ग्रेनाइट मंदिर बृहदेश्वर मंदिर कहाँ स्थित है?

तमिलनाडु के तंजौर में स्थित यह एक हिंदू मंदिर है।

बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कब हुआ था?

बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण 1003-1010 ई. के बीच हुआ था।

राजराजेश्वर मंदिर के वास्तुकार का क्या नाम था?

राजराजेश्वर मंदिर का वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुथच्चन था।